पुल हो तो ऐसा : 42 गांवों की ‘लाइफ लाइन’ सुरक्षित

चिन्यालीसौड़(उत्तरकाशी)। पहाड़ों में पुल गिरने की खबरें आम बात हो गई हैें, लेकिन दिचली गमरी इलाके के 42 गांवों को जोड़ने वाला पुल चौबीस साल से सुरक्षित है। यह तब है जब पुल साल के अधिकतर महीने पानी में डूबा रहता है। चिन्यालीसौड़ प्रखंड के दिचली गमरी में इस साल 5 अगस्त को झील का जलस्तर बढ़ने पर डूबा यह पुल रविवार को पानी उतरने पर बाद फिर थोड़ी बहुत क्षति के साथ बाहर निकल आया है। क्षेत्र के 42 गांवों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए वर्ष 1993 में देवीसौड़ झूला पुल का निर्माण हुआ था। भारी वाहनों की आवाजाही के लिए तैयार यह पुल इन गांवों की लाइफ लाइन है। वर्ष 2006 में टिहरी बांध बनने के अगले ही साल झील ने इस पुल को अपनी आगोश में लेना शुरू कर दिया था। इससे दिचली गमरी क्षेत्र के लोगों के सामने आने-जाने में परेशानी होनी शुरू हो गई थी। हालांकि झील में मोटर बोट और धरासू होते हुए सड़क का निर्माण कर समस्याओं को कुछ हद तक कम करने की कोशिशें हुईं, फिर भी स्थानीय लोगों की नजरें देवीसौड़ पुल पर ही लगी रहीं। झील का पानी उतरने पर पांच माह बाद यह पुल झील से बाहर निकल आया और आवाजाही शुरू हो गई। लगातार सात सालों से यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है।

जोखिम भरी है सड़क
चिन्यालीसौड़। क्षेत्र के भगवती प्रसाद नौटियाल, महावीर असवाल, शिव प्रसाद नौटियाल ने बताया कि धरासू होते हुए बनी सड़क बेहद जोखिम भरी है और अक्सर बंद रहती है। मोटर बोट से सफर का समय निश्चित नहीं है और उनसे क्षेत्र की जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं।

वर्ष 1993 में लोनिवि के देवीसौड़ झूला पुल का निर्माण गंगोत्री कंस्ट्रक्शन ने किया था। आईआईटी रुड़की से डिजाइन यह पुल 50 लाख रुपये लागत से तैयार हुआ। टिहरी बांध झील डूब क्षेत्र के करीब होने के कारण विभाग को निर्माण के दौरान ही थोड़ा ऊंचा करने का सुझाव दिया गया था। लेकिन तब इसे नहीं माना गया।- शंभू प्रसाद नौटियाल एवं दुर्गा प्रसाद नौटियाल, पुल बनाने वाले ठेकेदार।

हर साल झील में डूबने और बाहर आने के बाद भी देवीसौड़ पुल का खड़ा रहना इसकी मजबूती को दर्शाता है। आज के दौर के इंजीनियरों एवं ठेकेदारों को भी इस तरह के कार्यों से सबक लेकर अच्छी गुणवत्ता के कार्य कराने चाहिए।- बलवीर सिंह रांगड़, एडवोकेट चिन्यालीसौड़।

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